मजदूर...!!!
टूटा- फूटा है घर इनका,ना दो वक़्त की रोटी है,
बुरी हालातों से लड़ने वाले, इनकी इक्छाएं बहुत छोटी है||
इन्हें जमाने में फैली हुई नफरतों से क्या करना है,
इन्हें तो बस मतलब है अपने पेट की तपिश मिटाने से||
तपती गर्मी में कमाने को दो पैसे ये घर से निकलते है ,
लेकिन साथ , हांथ-पांव में छाले लेकर वो घर को लौटते हैं||
अमीरी में इंसान अक्सर अपना सुकून खो कर सोता है,
पर गरीब तो रूखी - सूखी भी खा कर सुकून से सोता है।।
अक्सर फुटपाथ पर ही अख़बार बिछा कर सो जाते है,
ये अमीरों की तरह कभी नींद की गोली नहीं खाते है।।
सड़को में ये अलाव जला कर ही ऐसे रह जाते है,
ख्वाबों का बिछोना ,आसमान की चादर बना सो जाते है।।
अपने खून-पसीने की खाते है और मिट्टी को सोना बनाते है,
इसलिए तो इनका देश के निर्माण में अमूल्य योगदान है||
सस्ते महंगे सभी काम परिवार के खातिर कर जाते हैं,
वो मजदूर है जो मलहम समझ घाव पर मिट्टी लगाते हैं।।
देश की सफलता में सबसे बड़ा योगदान इनका होता है,
श्रम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, एक मजदूर होता है।।
✍️✍️ प्रीति प्रिया
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